
रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाँसी में आयोजित चतुर्थ भारतीय उद्यानिकी शिखर बैठक सह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन -2026 का समापन समारोह संपन्न हुआ। यह आयोजन रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा बागवानी अनुसंधान एवं विकास समिति, उत्तर प्रदेश के सहयोग से किया गया।
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अशोक कुमार सिंह ने बताया कि उद्यानिकी आज कृषि का एक प्रमुख एवं तीव्र गति से उभरता क्षेत्र है, जिसका राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था एवं सकल घरेलू उत्पाद में योगदान निरंतर बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि फल, सब्जियाँ एवं पोषण एवं औषधीय महत्व वाली फसलें न केवल खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित कर रही हैं, बल्कि स्वास्थ्य आधारित कृषि की दिशा भी तय कर रही हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, मानकीकरण, रोग-कीट प्रबंधन तथा जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का समाधान प्राकृतिक खेती एवं जैविक खेती आधारित वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही संभव है।
प्रो. सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में नई उद्यानिकी विज्ञान का उद्भव हो रहा है, जिसमें सटीक खेती, संरक्षित खेती, पॉलीहाउस, हाईटेक नर्सरी, एवं स्मार्ट तकनीकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने स्वदेशी एवं ‘सुपर फ्रूट्स’, फसल विविधीकरण पर आधारित सफल मॉडल, सशक्त बाजार संपर्क और मूल्य संवर्धन पर विशेष बल दिया। साथ ही उन्होंने नवाचार अपनाने वाले प्रगतिशील किसानों को पहचान और सम्मान देने की आवश्यकता बताई, ताकि वे अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि उद्यानिकी आधारित विविधीकरण मॉडल किसानों की आय वृद्धि, रोजगार सृजन और टिकाऊ कृषि विकास में अहम भूमिका निभाएंगे। प्रो. सिंह ने वैज्ञानिकों और युवाओं से आह्वान किया कि वे अनुसंधान को प्रयोगशालाओं से निकालकर खेतों तक पहुँचाएँ, ताकि उद्यानिकी आधारित कृषि को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और रोजगारोन्मुख बनाया जा सके। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस सम्मेलन से निकले निष्कर्ष भविष्य की उद्यानिकी नीतियों एवं कार्यक्रमों को नई दिशा देंगे।
अध्यक्ष, बागवानी अनुसंधान एवं विकास समिति एवं भूतपूर्व कुलपति डॉ. बलराज सिंह, ने अपने संबोधन में कहा कि चतुर्थ भारतीय उद्यानिकी शिखर बैठक सह अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 2026 में देश के विभिन्न संस्थानों से बड़े वैज्ञानिकों ने भाग लिया इसमें 250 से अधिक वैज्ञानिक उपस्थित रहे। इस तीन दिवसीय सम्मेलन में मौखिक, पोस्टर, फसल सुधार, बीज की गुणवत्ता, मूल्य संवर्धन तथा फसलों को नुकसान पहुॅचाने वाले कीटों से कैसे बचा जा सकता है तथा फसलों में क्या-क्या समस्या आती है, बुंदेलखण्ड क्षेत्र में बागवानी को कैसे बढ़ाएं जिससे किसानों को अधिक से अधिक लाभ मिले इसमें फल, फूल, सब्जी, मोरिंगा, गार्डन, रेन वाटर, हारवेस्टिंग पर इस तीन दिवसीय सम्मेलन में विस्तृत सार्थक चर्चा हुई।
बुंदेलखण्ड क्षेत्र में कैसे विकास होगा, इस सम्मेलन में ठोस निर्णय लिया है। देश में बागवानी का निश्चित विकास होगा।
उद्यानिकी अनुसंधान, नवाचार और नीति-निर्माण के बीच सेतु का कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में स्वदेशी एवं अल्प-प्रयुक्त उद्यानिकी फसलों को मुख्यधारा में लाने की अत्यंत आवश्यकता है, इससे किसानों की आय में वृद्धि के साथ-साथ पोषण सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सके। उन्होंने सम्मेलन के दौरान आयोजित पैनल चर्चा को अत्यंत उपयोगी बताते हुए कहा कि इसमें देश-विदेश के वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों एवं उद्योग विशेषज्ञों ने भाग लेकर उद्यानिकी विकास से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन, मूल्य संवर्धन, विपणन एवं स्टार्ट-अप संभावनाओं पर गहन विचार-विमर्श किया। डॉ. सिंह ने कहा कि पैनल चर्चा से प्राप्त निष्कर्ष भविष्य की अनुसंधान रणनीतियों एवं किसान-हितैषी योजनाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाँसी के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय मंच बुंदेलखंड जैसे अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में उद्यानिकी को नई दिशा देने में सहायक सिद्ध होंगे तथा कृषि को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाएंगे।
आयोजन सचिव डॉ. मनीष श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में कहा कि यह एक शैक्षणिक आयोजन नहीं, बल्कि स्वदेशी, पोषण-संवेदनशील एवं अल्प-प्रयुक्त उद्यानिकी फसलों को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की एक ठोस पहल है। उन्होंने कहा कि उद्यानिकी क्षेत्र किसानों की आय वृद्धि, पोषण सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण उद्यमिता का मजबूत आधार बन सकता है। सम्मेलन के माध्यम से वैज्ञानिक नवाचार, स्टार्ट-अप्स, मूल्य संवर्धन और आधुनिक नर्सरी तकनीकों पर केंद्रित विचार-विमर्श भविष्य की कृषि दिशा तय करेगा।
बुंदेलखंड की अर्ध-शुष्क जलवायु, सीमित जल संसाधन एवं बदलते मौसम को दृष्टिगत रखते हुए क्षेत्र में मोरिंगा (सहजन), आंवला, बेल, आम, अमरूद, हरड़, बहेड़ा, सीताफल जैसी बहुवर्षीय एवं सहनशील फल-औषधीय फसलों के विस्तार की विशेष संभावनाएँ हैं। साथ ही जीरा, धनिया, मेथी, पालक, लौकी, तोरई (तेरियां) जैसी कम अवधि एवं कम जल वाली सब्जी-मसाला फसलें किसानों को त्वरित आय प्रदान कर सकती हैं। पोषण एवं बाजार मांग को ध्यान में रखते हुए ब्रोकली, गाजर, टमाटर जैसी उच्च मूल्य वाली सब्जियों के साथ-साथ अदरक एवं हल्दी जैसी मसाला-औषधीय फसलों तथा देशी गुलाब जैसी पुष्प फसलों की खेती से मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण और विपणन के माध्यम से किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
सम्मेलन की सिफारिशों के आधार पर यह अनुशंसा की गई कि स्वदेशी फसलों में हालिया वैज्ञानिक प्रगति को व्यापक रूप से अपनाते हुए क्षेत्र-विशिष्ट, जलवायु-सहिष्णु किस्मों का विकास एवं प्रसार किया जाए, ताकि बदलते मौसम की परिस्थितियों में उद्यानिकी उत्पादन को स्थिर और लाभकारी बनाया जा सके। परागण-मित्र फसलों तथा मधुमक्खी-आधारित उद्यानिकी प्रणालियों को बढ़ावा देकर उत्पादन वृद्धि के साथ पारिस्थितिक संतुलन सुनिश्चित करने पर बल दिया गया। इसके साथ ही पर्यावरणीय रूप से सतत सब्जी उत्पादन, प्राकृतिक संसाधन संरक्षण, गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन एवं स्थानीय बीज श्रृंखला सुदृढ़ीकरण, तथा उद्यमिता विकास के माध्यम से युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार सृजन की आवश्यकता पर जोर दिया गया। सम्मेलन में यह भी अनुशंसा की गई कि इन सभी पहलों को जैव विविधता संरक्षण के साथ समन्वित करते हुए लागू किया जाए, जिससे पोषण सुरक्षा, किसानों की आय वृद्धि और दीर्घकालिक टिकाऊ कृषि प्रणाली सुनिश्चित हो सके।
डॉ. वीपी सिंह भदोरिया एवं आवर्ती सिंह द्वारा लिखित किशोरावस्था संवाद, समझ और डिजिटल युग की चुनौतियां पुस्तक का विमोचन सभी अधिकारियों द्वारा किया गया।
भारतीय कृषि एवं बागवानी अनुसंधान विकास समिति के डॉ. जेके रंजन ने बताया कि इस तीन दिवसीय सम्मेलन में दस तकनीकी सत्र एवं 55 व्याख्यान के साथ अर्न्तराष्ट्रीय देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया, रूस, चिली, उज्बेकिस्तान, ईरान एवं अमेरिका से 5 व्याख्यान वर्चुअल माध्यम से हुए। अंतर्राष्ट्रीय अतिथि (एचओडी, मेडिसिनल प्लांट, उज्बेकिस्तान) डॉ. दिलफुज़ा जब्बारोवा ने औषधीय एवं वैकल्पिक फसलों की वैश्विक संभावनाओं पर अपने विचार साझा किए।
सम्मेलन के दौरान उत्कृष्ट शोध कार्य को प्रोत्साहित करने हेतु सर्वश्रेष्ठ मौखिक प्रस्तुति, सर्वश्रेष्ठ पोस्टर प्रस्तुति एवं सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक पुरस्कार प्रदान किए गए। इन पुरस्कारों के माध्यम से नवाचारपूर्ण अनुसंधान, वैज्ञानिक उत्कृष्टता एवं उद्यानिकी क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया, जिससे युवा वैज्ञानिकों एवं शोधार्थियों का उत्साहवर्धन हुआ। राष्ट्रगान के साथ सम्मेलन सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर विवि के सभी वरिष्ठ अधिकारी, सह आयोजन सचिव डॉ. मनमोहन डोबरियाल, डॉ. गौरव शर्मा, डॉ. राजेश कुमार सिंह, डॉ. ब्रजविहारी शर्मा, पूर्व अध्यक्ष, सब्जी विज्ञान प्रभाग, आईसीएआर-आईएआरआई डॉ. बीएस. तोमर सहित अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक एवं नीति-निर्माता, शोधार्थी उपस्थित रहे। संचालन डॉ. अर्तिका सिंह ने एवं सभी लोगों का आभार (सचिव, एसएचआरडी) डॉ. सोम दत्त ने व्यक्त किया।
